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Busss mera apna ghar ho....

Apna ghar hona kiska sapna nahi hota...chahe wo ek insan ho ya fir asmsn me udne wala pakshi...har kisi ka sapna hota hai ki uska apna ek asiyana ho... But agar hum gaur farmaye to ye sapne females ki comparison me male jyada discuss krte hai wo bhi tab jab wo indepandent ho jate h ya responsibility age me aajate hai..and what about girls???? Ohhh why do we need a own house we already have two ......isn't it? Yhi to soch hoti hai sabki ...infacg hamari bhi ki hmare to 2 ghar hai bachpan me mayka n baad me sasural...sb hamara hi to hai .....magar kaise ????kya wakai esa hai ...to chalo aaj fir roobaroo hote hai ek hakikat se...ki hum ladkiya sbse jyada rich hoti hai ya poor...hmare 2 ghar hote hai ya ek bhi nahi.... Mai apni hi jindgi ke kuch pahlu utha leti hu.....vaise to india me 99 % girls hai jinhone ye dialogue suna hi hoga ki " beta saare kaam seekh lo kal apne ghar jaygi to kaise karegi...."  ya fir ye..."nahi hum iski izazat nahi de sakte ye sb shadi ke ...

Sahi galat insan nahi situations hoti hai

Hamari jindgi nikal jati h logo ko sagi galat batate batate magar kya kabhi socha hai ek hi insan ek ke liye sahi dusre ke liye galat kaise ho sakta hai...koi insaan kabhi hame duniya me sabse sahi lagta hai aur kabhi wahi insan sabse jyada galat...to kya sahi galat wo insaan hua ya uski wo situations jinhone kabhi use galat sabit kiya to kabhi sahi......kuch esa hi to hua tha uski jindgi me bhi ...mai gawah thi uske tut te rishte ki ...magar is sahi galat ke khel me aansu to bahe the...is sahi galat ke khel me dil to tute the...galat to wo bhi nahi thi galat to wo situations thi jisne usko galat sabit kar diya tha ....mai hairaan thi dekh kar unke tut te hue rishte ko bahut pyar krte the wo ek dusre se..magar aaj is rishte me zagar ke siva mujhe kuch najar nahi aata tha ...ek pal me wo sab bhul kar whi pyar krte aur agle hi pal ye rishta nafrat se bhar jata tha mai samjh nahi paa rhi thi ki kya ye dono wakai alag hona chahte the...kya tha esa jo itne utaar chadhaav ke baad bhi is ris...

Kuch rah to nahi gaya

                                   “कुछ रह तो नहीं गया” ये शब्द सुनते सुनते हम बड़े हो गये मगर आज तक हमें सार समझ नहीं आया की आखिर किस चीज़ के लिए हमसे पुछा जा रहा है की “कुछ रह तो नहीं गया ...बचपन में जब स्कूल जाते थे मम्मी पीछे से आवाज देती थी सब रख लिया ना  बैग में कुछ रह तो नहीं गया ..कभी हम बोल नहीं पाए की हमारी गुडिया तो यही  रह गयी अब शाम को ही खेल पाएंगे ...बस जल्दी से कह देते हाँ हाँ सब रख लिया .... फिर पूरा दिन छुट्टी का इंतज़ार करते करते जब वो वक्त आता तो टीचर सबको लाइन में लगा के कहती बच्चो सब अपनी अपनी सीट चेक कर लो “कुछ रह तो नहीं गया ...बस सब घर जाने की जल्दी में बोल देते जी टीचर जी देख लिया ...कौन कहता की पूरा दिन मस्ती करते करते जितने पन्ने फाड़ कर एरोप्लने बनाकर उडाये थे वो तो यही सीट के निचे रह गये ...ब्लैक बोर्ड की छोटी छोटी चौक तो यही रह गयी.... जब कुछ बड़े हुए और वक्त शादी का आ गया तो विदा होते टाइम माँ की आवाज फिर से आई ...बेटा सब रख लिया न देख जरा “कुछ रह तो नहीं गय...

बस जरुरत थी तो अपनी strength को समझ पाने की ....

इस दुनिया में हजारो लड़कियां रोज जन्म लेती है और हजारो रोज इस दुनिया को अलविदा कहती हैं पर क्या हर लड़की ईमारत की चमकती ईंट होती है या फिर नीव की दबी ईंट रह  जाती है एक  लड़की जब जन्म लती है तो हज़ार बाते होती हैं घर वालो में रिश्तेदारों में ,दोस्तों में या सब में ...आज वक्त बदल गया है लड़के लड़की में कोई फर्क नहीं रहा मगर क्या ये फर्क हर किसी के लिए ख़तम हो गया है या सिर्फ कुछ ही लोगो की सोच बदल पाई है ...आज भी न जाने कितने एसे घर हैं जहाँ लड़की के जन्म पर खुशियाँ मनाई जाती है ...लड़की होने की इच्छा जताई जाती है उसे भी वही प्यार आदर सम्मान और हर सुख सुविधा देकर पाला जाता है ...मगर फिर भी वो लड़की ईमारत की चमकती ईंट की list में जगह नहीं बना पाती . और आज भी हजारो एसे घर हैं जहाँ लड़की के जन्म  को एक अभिशाप माना  जाता है पूर्व जन्मो का बदला समझा जाता है हर जगह उसे लडको से  कम आँका जाता है मगर फिर भी वो नीव की ईंट नहीं ईमारत की ईंट बन जाती है मगर कैसे ... क्या एक लड़की में दो की जगह एक हाथ, एक पाँव ,एक आँख एक कान होता है या फिर कोई भी चीज़ कम होती है ...नहीं कम होता है तो आत...

वो मेरी life का golden page था

life में golden page होना खुद में एक achievement लगता है ..मगर क्या सच में golden page हम अच्छे  page के लिए ही बोलेंगे या फिर उस page के लिए जो कभी न मिटने वाला page हो फिर चाहे वो अच्छा हो या बुरा ! खैर अभी बात अच्छे page की ही हो रही है ... मेरा दोस्त जो फेसबुक के जरिये मेरी life में दाखिल हुआ था ...वो मेरे जीवन का एसा पन्ना है जो कभी स्वीट लगता है तो कभी bitter..!मगर हाँ जो golden moments मैंने उस दोस्ती में जिए थे वो यादगार हैं और रहंगे ! मुझे हमेशा से तलाश थी एक इसे दोस्त की जिस से बेझिझक हम कुछ भी बोल सके वो दोस्त शायद एक जीवन साथी या माँ भी कभी नहीं हो सकती थी ...खैर हमारी दोस्ती दिन दोगुनी रात चोगुनी बढ़ रही थी ...पहले पहले कुछ झिझक हुई क्योकि मैंने कभी फेसबुक फ्रेंड नहीं बनाया था उसे friend बना कर unfriend भी किया मगर शायद ये दोस्ती hamari नियति थी और हम फिर से दोस्त बने ..कभी न ख़तम होने वाली बाते भी शुरू हो गयी और हम अपने अपने जीवन के पन्ने एक दुसरे के सामने खोलते चले गये मुझे एक बात पहुत पसंद आई थी उसमे की उसने अपनी life के वो page भी मेरे सामने रख दिए थे जो आज कल क...

सारी लड़ाई सच और झूट की थी ....

हाँ सारी  लड़ाई सच और झूठ की ही तो थी ,,,मैंने जब भी अपनी जिंदगी के बीते पन्ने पलटे हर जगह बात सच और झूठ पर ही ख़तम या शुरू हुई थी !आज सारे रिश्ते सारे पल स्मृति बन कर तैर रहे थे मेरी आँखों के सामने ! कुछ पल आज भी चेहरे पर हंसी ले आये और कुछ पल आज भी कडवाहट से भरे थे हाँ बहुत कुछ पीछे छोड़ आई थी मै मगर कहीं न कहीं आज भी बंधी थी हर उस बात से जो मुझ से होकर गुजरी थी.! आज मुझे हर वो टुटा रिश्ता याद आया जहाँ लड़ाई सच और झूठ पर आकर सिमट गयी थी ..कहीं मै सही थी कही वो ...मुझे हमेशा से नफरत थी मुखोटा लगाकर घूमने वाले इंसानों से और जहाँ तक मैंने पन्ने पलटे हर कोई उन्ही मुखोटो में शामिल था ! मुझे आज भी याद है मेरा वो पहला प्यार जिसे मैंने पूरी सिद्दत से चाहा था मगर उसके उस double face ने हमारे रिश्ते को तोड़ने में अहम् भूमिका निभाई थी !एक अच्छा और सुलझा हुआ इन्सान था वो ये सच है ..हम दोनों खुश भी  थे मगर सिर्फ तब तक जब तक की मै उन चार दीवारों में थी मगर जैसे ही मैंने दुनिया में कदम रखा उसका रवैया बदलने लगा था ..उसकी मनमानी और दबाव मुझ पर साफ़  दिखने  लगा था मै उसकी मर्जी से...

weak नहीं strong लोग करते हैं suicide ....

suicide करना हमारे समाज में एक कायरता समझी जाती है !हाँ सच भी है की जो लोग हालातों से लड़ नहीं पाते वो लोग ही आत्महत्या करते हैं मगर क्या वो लोग वाकई कायर या कमजोर होते है ..अगर वो कायर होते है तो आत्महत्या करने जैसी हिम्मत उनमे कैसे होती है ..क्या ये कदम उठाना इतना आसन होता होगा !इसी से  पता लगता है की जो लोग आत्महत्या करते हैं वो मानसिक रूप से कमजोर नहीं बल्कि सबसे ज्यादा हिम्मत वाले होते हैं .. अक्सर जब एसी कोई घटना हमारे सामने आती है तो हम ज्यादातर लोगो से उस सुसाइड करने वाले इंसान के बारे में यही सुनते हैं कि "क्या उसने सुसाइड कर लिया ? नहीं वो एसा कैसे कर सकता  है या कर सकती है "???? इसका मतलब तो साफ़ है की वो इंसान एसा कैसे कर सकता है यानि हमने हमेशा उसे मजबूत देखा होगा ... मगर फिर भी  ये कदम तो था ही कायरता का प्रतीक क्योंकि जो  भी  हो ये कदम मेसेज तो यही देता है की वो इंसान हार चूका था .. आज कल प्रतियुषा सुर्खियों में है ..छोटी आनंदी जिसे हम ने टीवी सीरियल में देखा जो रोल संघर्षों से भरा था ...उसकी असल जिन्दगी में भी उसके करीबे दोस्तों ने यही कहा की ह...